माँ मैं कायर नहीं
देश के एक उच्चतम संस्थान का हॉस्टल क्रमांक चार| कैंटीन से उठती हुयी काफी की महक और गलियारों से आता हुआ छात्रों का उल्लास भरा शोर, आज पियूष को आहत कर रहे थे| हॉस्टल का ये विशिष्ट वातावरण कल तक उसके अंदर एक स्फूर्ति और ताजगी भर देता था, और फ्रेंड्स के साथ रूम में बैठ कर वह भविष्य की नयी नयी तकनीकी डिजाइन करता था| किन्तु आज वह हताशा के गहन अन्धकार में जा पंहुचा था| अभी कुछ महीने पूर्व ही इस संस्थान में आने का गौरव उसे प्राप्त हुआ था| गृह-नगर के प्रत्येक घर में उसके इस अभूतपूर्व चयन की चर्चा हुयी थी| लेकिन आज मिड-सेम के दौरान लगातार दूसरा पेपर बिगड़ने से वह व्याकुलता की सीमा के लाल निशान पर जा पंहुचा था| यद्यपि वह समझ रहा था कि यह दौर अनायास ही नहीं आ गया है| दरअसल यहाँ अध्ययन के कुछ बदले हुए स्वरुप के साथ अब तक वह अपना सामंजस्य नहीं बैठा पाया था| संभवतः उसके सरल मन-मस्तिष्क ने एक प्रतिष्ठित संस्थान में हुए अपने चयन को ही जीवन की अंतिम उपलब्धि मान लिया था| और इस सोच के चलते उसने एक नये सिस्टम के साथ तालमेल बैठाने या समय एवं परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने के प्रयास ही नहीं किये थे| प्रारंभ के कुछ दिनों तक तो उसने अपनी समस्याओं को मित्रों के समक्ष रखा भी, किन्तु जैसे जैसे दिन गुजर रहे थे उसकी सोच भी बदलती जा रही थी| अब किसी के साथ अपनी समस्या शेयर करने में उसे कठिनाई महसूस होने लगी थी| यह सोच कर कि वह अन्य साथियों के साथ नहीं चल पा रहा है, वह स्वयं को ही कमजोर मानकर क्रमशः हीन भावना का शिकार होने लगा| अपरिचित सी व्यवस्था एवं इससे कभी न उबर पाने का डर उस पर हावी हो गया था| साथियों से दूरियां बढ़ गयी थी, और वह गुम-सुम सा रहने लगा था|
नये सिस्टम को समझने एवं उसके अनुसार स्वयं को ढालने की जगह उसने स्वयं को ही कमतर आंकने की भारी भूल की थी| लेकिन अब तो देर हो चुकी थी| उसके प्राप्तांक संस्थान के मानक स्तर से नीचे आ चुके थे| घर वालों को फोन पर वह केवल इतना बता पाया था कि पेपर बिगड़ गया है| अब वह क्या करेगा, साथी क्या सोचेंगे, अपने गृहनगर किस मुँह से जाएगा इत्यादि सोचते सोचते कितने घंटे बीत गए उसे पता ही न चला| कुछेक कमरों को छोड़कर लगभग सारा हॉस्टल अँधेरे के आगोश में जा चुका था| सुबह के तीन बज चुके थे| पास ही पटरियों से गुजर रही रात्रिकालीन सन्नाटे को तोड़ती हुई ट्रेन की कूक भी पियूष का ध्यान नहीं भंग कर सकी थी| नींद कोसों दूर थी| वह तो बस सोचे जा रहा था| माँ ने तो दिलासा दे दी है कि “हिम्मत नहीं हारना, सब ठीक हो जायेगा|” परन्तु उनको कैसे बताएगा कि उसे अब निकाला भी जा सकता है| अपने गृहनगर लौटकर वह लोगों से क्या कहेगा? लोग तो यही कहेंगे कि पियूष इस संस्थान के लायक ही नहीं था| और हर बार वह हीन भावना से भर उठता| शायद मैं इस संस्थान के लिए उपयुक्त नहीं हूँ, वरना मेरे साथ ही ऐसा क्यों? उसे मात्र हताशा भरे दृश्य ही दिखाई दे रहे थे, जैसे वह अपने कमरे से निकल रहा है और सभी उसे ही घूर रहे हैं एक असफल व्यक्तित्व के रूप में| नहीं नहीं...... मैं इनसे नजरें नहीं मिला सकूंगा| मैं यहाँ रुकूंगा ही नहीं| वह कमरे से बाहर आ गया| लेकिन वह जायेगा कहाँ ? अब तो घर भी नहीं जा सकता, अब क्या करेगा? सुबह की हल्की ठण्ड में भी उसकी हथेलियों पर पसीना आ रहा था| अपने कॅरिअर से कहीं ज्यादा लोक-लाज का भय उसके मन मस्तिष्क पर ऐसा दबाव बना रहा था कि उसकी मनोदशा बिगड़ती चली जा रही थी| वह अवसाद के गहन अंधेरों में जा चुका था जहां उसे अब कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था| आखिरकार एक वीभत्स निर्णय के साथ वह रेल-पटरी की ओर बढ़ने लगा | अवसाद के जंगल में भटकते हुए वह रेल पटरियों के काफी नजदीक आ गया| अँधेरा उसके इस अवसाद पर मरहम का काम कर रहा था| क्योंकि दिन निकलने पर उस समाज का सामना होना था जिससे वह डर रहा था| वह ट्रेन का इंतज़ार करता हुआ पटरी के पास ही बैठ गया| यद्यपि जीवन-द्वंद लगातार चल रहा था किन्तु कायरता हर बार विजित हो जाती, और वह ट्रेन की प्रतीक्षा में और अधिक व्याकुल हो जाता|

bahut sundar sir ji
ReplyDeletevery inspiring
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